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अब हरदा ने छोड़ा नया शिगूफ़ा: उत्तराखंड में राजनीतिक स्थिरता के लिए बने 21 सदस्यीय विधान परिषद, तिवारी राज की लालबत्तियों के बोझ से मुक्त हुई जनता पर रावत चाहते पड़े नया बोझ!

देहरादून: अविभाजित उत्तरप्रदेश में पर्वतीय अंचल की उम्मीदों और आकांक्षाओं को पूरा होना में आ रही बाधाओं के हल के रूप में उत्तराखंड राज्य का उदय होता है। हालांकि गुज़रे 20-22 सालों में पर्वतीय क्षेत्र की उपेक्षित जनता की उम्मीदों-आकांक्षाओं की पूर्ति भले न हुई हो लेकिन राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं के पंख खूब लगे। राज्य की पहली निर्वाचित सरकार में सीएम एनडी तिवारी ने जमकर लालबत्तियां बांटकर टैक्सपेयर जनता की कमर तोड़ी। अब 20 साल बाद एक बार फिर जब पांचवे विधानसभा चुनाव हो रहे तब पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने राज्य में राजनीतिक अस्थिरता न हो इसके लिए 21 सदस्यीय विधान परिषद गठन का सुझाव पेश किया है।

जाहिर है यह पहली बार नहीं है जब जनता के विकास के नाम पर राज्य में विधान परिषद गठन का शिगूफ़ा छोड़ा गया हो। खुद हरीश रावत 2002 में भी विधान परिषद गठन का राग अलाप चुके हैं और अब ठीक चुनाव से पहले हरदा ने पुराना राग छेड़ दिया है।

सवाल है कि क्या वाकई विधान परिषद बनाने से राजनीतिक अस्थिरता रुकेगी और विकास का पहिया चौकड़ी भरेगा? या फिर विधान परिषद गठन का मकसद सिर्फ इतना भर कि राजनीतिक दलों के विधायक बनने से रह गए या कहीं एडजेस्ट होने से रह गए नेताओं-कार्यकर्ताओं के लिए विधान परिषद की चाहत हिलोरे मार रही हैं?

पूर्व सीएम रावत तर्क दे रहे हैं कि चूंकि उत्तराखंड जैसे राज्य में 12 मंत्री ही बनाए जा सकते हैं लेकिन विभाग तमाम बड़े राज्यों की तरह ही सारे संभालने होते हैं। जाहिर है रावत कहना चाह रहे हैं कि ज्यादा विभाग तुलनात्मक रूप से कम मंत्रियों को संभालने पड़ते हैं जिससे जनता के विकास की गाड़ी की रफ्तार धीमी पड़ जाती होगी।


सवाल है कि जिस राजनीतिक अस्थिरता का हवाला हरदा दे रहे क्या इसकी दोषी जनता है? या फिर सियासत की अति महत्वाकांक्षाओं ने सूबे के हालात बदतर कर डाले! अगर ऐसा न होता तो बीस साल में 11वां मुख्यमंत्री राज्य में न बन गया होता! नेताओं की महत्वाकांक्षाओं और एक-दूसरे को गिराकर हर हाल में सत्ता हथियाने के सियासी षड्यंत्रों ने तोहफ़े के तौर पर जनता को अस्थिरता परोसी है। ऐसे में भला 21 सदस्यीय विधान परिषद बन भी जाएगी तो क्या गारंटी है कि मंत्री-मुख्यमंत्री बनने की होड़ और घोड़ामंडी में बिकने की दौड़ थम जाएगी? लेकिन ऐसा कहकर कम से कम हरदा अपने समर्थकों में नए सपनों का बीजारोपण तो कर ही सकते हैं, क्या पता बाइस में इक्कीस होने में यह शिगूफा भी काम आ जाए!

यहां पढ़िए पूर्व सीएम हरीश रावत ने क्या कहा हूबहू:-

एक बिंदु विचारार्थ बार-बार मेरे मन में आता है कि उत्तराखंड में #राजनैतिक स्थिरता कैसे रहे! राजनैतिक दलों में आंतरिक संतुलन और स्थिरता कैसे पैदा हो! जब स्थिरता नहीं होती है तो विकास नहीं होता है, केवल बातें होती हैं। मैं पिछले 21 साल के इतिहास को यदि देखता हूँ तो मुझे लगता है कि उत्तराखंड के अंदर राजनैतिक अस्थिरता पहले दिन से ही हावी है। उत्तराखंड में प्रत्येक राजनैतिक दल में इतने लोग हैं कि सबको समन्वित कर चलना उनके लिये कठिन है और कांग्रेस व भाजपा जैसे पार्टियों के लिए तो यह कठिनतर होता जा रहा है। केंद्र सरकार का यह निर्णय कि राज्य में गठित होने वाले मंत्रिमंडल की संख्या कितनी हो, उससे छोटे राज्यों के सामने और ज्यादा दिक्कत पैदा होनी है। अब उत्तराखंड जैसे राज्यों में मंत्री 12 बनाए जा सकते है, मगर विभाग तो सारे हैं जो बड़े राज्यों में है, सचिव भी उतने ही हैं जितने सब राज्यों में हैं। मगर एक-एक मंत्री, कई-2 विभागों को संभालते हैं, किसी में उनकी रूचि कम हो जाती है तो किसी में ज्यादा हो जाती है और छोटे विभागों पर मंत्रियों का फोकस नहीं रहता है और उससे जो छोटे विभाग हैं उनकी ग्रोथ पर विपरीत असर पड़ रहा है, जबकि प्रशासन का छोटे से छोटा विभाग भी जनकल्याण के लिए बहुत उपयोगी होता है तो मैंने कई दृष्टिकोण से सोचा और मैंने पाया कि उत्तराखंड जैसे राज्य के अंदर हमें कोई न कोई रास्ता ऐसा निकलना पड़ेगा, जिस रास्ते से राजनैतिक दल चाहे वो सत्तारूढ़ हो या विपक्ष हो उसमें राजनैतिक स्थिरता रहे और एक परिपक्व राजनैतिक धारा राज्य के अंदर विकसित हो सके और एक निश्चित सोच के आधार पर वो राजनैतिक दल आगे प्रशासनिक व्यवस्था और विकास का संचालन करें। यहां मेरे मन में एक ख्याल और आता है, क्योंकि तत्कालिक संघर्ष से निकले हुये लोगों के साथ बातचीत कर मैंने कांग्रेस पार्टी के घोषणा पत्र में 2002 में विधान परिषद का गठन का वादा किया था, तो कालांतर में कतिपय कारणों के कारण गठित नहीं हो पाई और उसके बाद के जो अनुभव रहे हैं, वो अनुभव कई दृष्टिकोणों से राज्य के हित में नहीं रहे हैं। इसलिये मैं समझता हूँ कि फिर से इस प्रश्न पर विचार करने की आवश्यकता पड़ रही है कि विधान परिषद होनी चाहिए या नहीं होनी चाहिए! और मैं समझता हूंँ 21 सदस्यीय विधान परिषद उपयोगिता के दृष्टिकोण से उत्तराखंड जैसे राज्य के लिए बहुत लाभदायी हो सकती है, राजनैतिक स्थिरता पैदा करने वाला कारक बन सकती है। इससे राज्य में नेतृत्व विकास भी होगा, इस समय, समय की परख के साथ और उत्तर प्रदेश के समय से जिन लोगों ने थोड़ा सा अपना व्यक्तित्व बना लिया था वो तो आज भी राज्य के नेतृत्व की लाइन में सक्षम दिखाई देते हैं। लेकिन जो लोग उत्तर प्रदेश के समय से जिन्हें विशुद्ध रूप से हम यह कहे कि वो उत्तराखंड बनने के बाद राजनीति में प्रभावी हुए हैं तो ऐसे व्यक्तित्व कांग्रेस और भाजपा में कम दिखाई देंगे।

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